अखिलेश यादव के ‘घुसपैठिये’ ने पुराने जख्मों पर फिर छिड़का नमक, उत्तराखंड में ‘साइकिल पंचर’

उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी (सपा) की राजनीतिक जमीन लगातार कमजोर होती गई है। कभी हरिद्वार लोकसभा सीट जीतकर संसद तक पहुंचने वाली पार्टी आज प्रदेश में महज 0.29 प्रतिशत वोटों पर सिमट चुकी है। ऐसे में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के उत्तराखंड के लोगों को लेकर दिए गए ‘घुसपैठिये’ संबंधी बयान ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए अखिलेश यादव से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है।
उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने में जुटे अखिलेश यादव का यह बयान उत्तराखंड में सियासी बहस का विषय बन गया है। राज्य में समाजवादी पार्टी पहले से ही कमजोर संगठन और वर्ष 1994 के रामपुर तिराहा कांड से जुड़ी राजनीतिक छवि की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह बयान उत्तराखंड में सपा की वापसी की संभावनाओं को और कमजोर कर सकता है?
ढाई दशक में सियासी सफर हाशिये तक पहुंचा
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 56 सीटों पर चुनाव लड़कर करीब 7.89 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। हालांकि, बेहतर वोट प्रतिशत के बावजूद पार्टी विधानसभा में अपना खाता नहीं खोल सकी।
वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार सीट पर जीत ने सपा को उत्तराखंड में अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाशने का मौका दिया। लेकिन लोकसभा की यह कामयाबी प्रदेश में स्थायी जनाधार तैयार करने में सफल नहीं रही।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत करीब 6.5 प्रतिशत रहा। इसके बाद सपा का जनाधार लगातार कमजोर होता गया। वर्ष 2012 में वोट प्रतिशत घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत रह गया, जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 18 सीटों पर चुनाव लड़कर महज 0.37 प्रतिशत वोट हासिल किए।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 55 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, लेकिन पार्टी का वोट प्रतिशत गिरकर सिर्फ 0.29 प्रतिशत रह गया। इस तरह उत्तराखंड में कभी राजनीतिक उम्मीद जगाने वाली सपा आज प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर नजर आ रही है।
अखिलेश के बयान से गरमाई सियासत
लखनऊ में शुक्रवार को मीडिया से बातचीत के दौरान अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में घुसपैठियों से जुड़े सवाल पर उत्तराखंड के लोगों का जिक्र किया। उनके इस बयान पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और सार्वजनिक माफी की मांग की।
इस बयान के बाद उत्तराखंड में सपा की राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पार्टी के सामने पहले ही अपना संगठन मजबूत करने और खोया हुआ जनाधार वापस पाने की चुनौती है। ऐसे में उत्तराखंड के लोगों को लेकर दिए गए बयान का राजनीतिक असर आने वाले समय में देखने को मिल सकता है।
रामपुर तिराहा कांड की यादें अब भी चुनौती
उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी के सामने केवल संगठन की कमजोरी ही चुनौती नहीं है, बल्कि राज्य आंदोलन से जुड़ी उसकी राजनीतिक छवि भी एक बड़ा मुद्दा रही है।
वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में आंदोलनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी और महिलाओं के साथ यौन हिंसा की घटनाओं ने राज्य के लोगों की स्मृति पर गहरा प्रभाव छोड़ा। यह घटना तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के कार्यकाल से जुड़ी होने के कारण उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दल भी समय-समय पर इस मुद्दे को सपा के खिलाफ उठाते रहे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव के ताजा बयान ने पार्टी के सामने राजनीतिक और जनधारणा से जुड़ी चुनौतियों को फिर चर्चा में ला दिया है।
क्या उत्तराखंड में वापसी की राह होगी मुश्किल?
करीब ढाई दशक के राजनीतिक सफर में समाजवादी पार्टी उत्तराखंड में अपने शुरुआती जनाधार को बरकरार नहीं रख सकी। हरिद्वार लोकसभा सीट पर मिली जीत के बावजूद पार्टी विधानसभा की राजनीति में मजबूत विकल्प नहीं बन पाई।
अब अखिलेश यादव के बयान को लेकर उठे विवाद के बीच पार्टी के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर संगठन को मजबूत करना और दूसरी ओर राज्य के लोगों के बीच अपनी राजनीतिक छवि को लेकर बनी धारणाओं का सामना करना। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सपा इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और उत्तराखंड में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने के लिए क्या रणनीति तैयार करती है।









