उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में छात्रों का हल्लाबोल, 24 घंटे से टंकी पर डटे 5 छात्र

देहरादून न्यूज़– उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय से संबद्ध निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के छात्रों का आंदोलन गुरुवार को दूसरे दिन भी जारी रहा। परीक्षा आयोजित नहीं होने और लंबे समय से लंबित परिणाम जारी न किए जाने से नाराज छात्र विश्वविद्यालय परिसर में प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान पांच छात्र 24 घंटे से अधिक समय से पानी की टंकी पर चढ़े हुए हैं। छात्रों का आरोप है कि इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक उनसे कोई ठोस बातचीत नहीं की गई है।
विश्वविद्यालय से जुड़े अलग-अलग निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के करीब 1500 छात्र-छात्राएं परीक्षा और परिणाम को लेकर लंबे समय से परेशान हैं। छात्रों का कहना है कि पिछले करीब डेढ़ साल से वे लगातार परीक्षाएं कराने, लंबित परिणाम जारी करने और डिग्री की प्रक्रिया पूरी करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहा है।
गुरुवार को प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन का पुतला फूंका और जमकर नारेबाजी की। इस बार छात्रों के आंदोलन को कांग्रेस और भारतीय किसान यूनियन का भी समर्थन मिला है, जिसके बाद आंदोलन और मुखर हो गया है।
2019 से 2024 बैच तक के छात्र प्रभावित
छात्रों के अनुसार विश्वविद्यालय से संबद्ध करीब 11 निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के वर्ष 2019 से 2024 बैच तक के विद्यार्थी इस विवाद से प्रभावित हैं। इनमें कोर, मदरहुड, ओम, एरोमा, शिवालिक, उत्तरांचल, देवभूमि, सूरजमल और मंजिला देवी समेत अन्य कॉलेजों के छात्र शामिल बताए जा रहे हैं।
छात्रों का कहना है कि अलग-अलग बैच की स्थिति अलग है। कुछ बैच की परीक्षाएं पूरी हो चुकी हैं, लेकिन उनके परिणाम रोक दिए गए हैं। कुछ विद्यार्थियों की आगे की परीक्षाएं ही नहीं कराई गई हैं। ऐसे में एक ही विश्वविद्यालय से जुड़े छात्रों को अलग-अलग स्तर पर शैक्षणिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
छात्रों का आरोप है कि फीस लेने के बाद उनकी पढ़ाई, परीक्षा, परिणाम और डिग्री की पूरी प्रक्रिया सुनिश्चित करना विश्वविद्यालय और संबंधित कॉलेजों की जिम्मेदारी है।
खाली सीटों से शुरू हुआ विवाद, कॉलेज पहुंचे थे कोर्ट
छात्रों के मुताबिक विवाद की शुरुआत निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों में खाली रह गई सीटों से हुई। नियमित काउंसलिंग के बाद कई कॉलेजों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गई थीं। छात्रों का कहना है कि कॉलेजों ने खाली सीटों से होने वाले आर्थिक नुकसान का हवाला देते हुए न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की कार्यवाही के बाद ऐसे विद्यार्थियों को प्रवेश देने की स्थिति बनी, जिन्होंने नीट परीक्षा में भाग लिया था। इसी प्रक्रिया के तहत कई छात्रों को नॉन-काउंसलिंग श्रेणी में प्रवेश दिया गया।
छात्रों का दावा है कि प्रवेश के बाद विश्वविद्यालय ने उनके दस्तावेजों का सत्यापन किया, नामांकन किया और कई मामलों में परीक्षाएं भी कराईं।
छात्रों का सवाल- जब नामांकन किया तो पढ़ाई अधूरी क्यों?
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का सबसे बड़ा सवाल विश्वविद्यालय की इसी प्रक्रिया को लेकर है। उनका कहना है कि यदि नॉन-काउंसलिंग के माध्यम से हुए प्रवेश को लेकर कोई विवाद था तो विश्वविद्यालय ने दस्तावेजों का सत्यापन और नामांकन क्यों किया।
छात्रों के अनुसार उनसे निर्धारित फीस ली गई और इसके बाद उन्हें परीक्षाओं में बैठने की अनुमति भी दी गई। कई विद्यार्थियों ने अलग-अलग वर्षों की परीक्षाएं भी पास कीं। अब जब कुछ बैच की पढ़ाई अंतिम चरण में पहुंच चुकी है तो परीक्षा, परिणाम और डिग्री रोक दिए जाने से छात्र असमंजस में हैं।
छात्रों का कहना है कि नामांकन केवल एक वर्ष की परीक्षा के लिए नहीं बल्कि पूरे पाठ्यक्रम की अवधि के लिए होता है। ऐसे में प्रवेश और नामांकन के बाद पूरी डिग्री प्रक्रिया पूरी कराने की जिम्मेदारी भी संबंधित संस्थानों की होनी चाहिए।
2019 और 2020 बैच की पढ़ाई पूरी, फिर भी डिग्री और परिणाम पर संकट
सबसे अधिक परेशानी उन छात्रों को हो रही है जिनकी पढ़ाई लगभग पूरी हो चुकी है। 2019 बैच के विद्यार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय ने प्रथम वर्ष से अंतिम वर्ष तक उनकी परीक्षाएं कराईं और परिणाम भी जारी किए। लेकिन अब डिग्री देने के समय नॉन-काउंसलिंग प्रवेश को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
छात्रों के अनुसार इसी मामले में वे उच्च न्यायालय तक गए और डिग्री जारी करने को लेकर आदेश भी प्राप्त किया। उनका आरोप है कि इसके बावजूद कुछ विद्यार्थियों को डिग्री मिल गई, जबकि कुछ की डिग्री रोक दी गई। इस मामले में छात्रों ने न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की है।
वहीं 2020 बैच की स्थिति भी विवादित बताई जा रही है। छात्रों का कहना है कि इस बैच की प्रथम वर्ष से अंतिम वर्ष तक परीक्षाएं हो चुकी हैं, लेकिन कुछ विद्यार्थियों के परिणाम जारी किए गए, जबकि कुछ के परिणाम रोक दिए गए।
2021 बैच का पहला परिणाम आया, आगे की परीक्षाएं नहीं हुईं
2021 बैच के छात्रों की स्थिति अलग बताई जा रही है। छात्रों के अनुसार न्यायालय के आदेश के बाद विश्वविद्यालय ने उनका नामांकन किया और प्रथम वर्ष की परीक्षा भी कराई। इसका परिणाम भी जारी कर दिया गया, लेकिन इसके बाद आगे की परीक्षाएं नहीं कराई गईं।
छात्रों का कहना है कि अब विश्वविद्यालय की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि आगे की परीक्षा कराने के लिए न्यायालय का अलग आदेश आवश्यक है।
इस पर छात्रों का सवाल है कि जब एक बार न्यायालय के आदेश के आधार पर प्रवेश, नामांकन और प्रथम वर्ष की परीक्षा कराई जा चुकी है तो फिर प्रत्येक अगले वर्ष की परीक्षा के लिए अलग आदेश की जरूरत क्यों पड़ रही है।
फीस जमा, पढ़ाई पूरी लेकिन परीक्षा का इंतजार
विवाद केवल 2019, 2020 और 2021 बैच तक सीमित नहीं है। छात्रों के मुताबिक बाद के बैच के कई विद्यार्थी भी परीक्षा नहीं होने के कारण प्रभावित हैं।
छात्रों का कहना है कि उन्होंने कॉलेजों में प्रवेश लिया, फीस जमा की और नियमित पढ़ाई की, लेकिन अब परीक्षा की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। इससे विद्यार्थियों का पूरा शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो रहा है।
एक बैच की परीक्षा लंबित होने का असर अगले बैच की पढ़ाई और इंटर्नशिप पर भी पड़ रहा है। छात्रों का कहना है कि परीक्षा की तारीख स्पष्ट नहीं होने के कारण उनका भविष्य अधर में लटक गया है।
साढ़े पांच साल का बीएएमएस कोर्स सात-आठ साल में भी पूरा नहीं
बीएएमएस पाठ्यक्रम की पढ़ाई और इंटर्नशिप मिलाकर सामान्य रूप से करीब साढ़े पांच साल का समय माना जाता है। लेकिन छात्रों का आरोप है कि परीक्षा और परिणाम में लगातार देरी के कारण उनकी पढ़ाई सात से आठ साल तक खिंच रही है।
2019 बैच के कई विद्यार्थी अब भी डिग्री प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। छात्रों के मुताबिक 2018 बैच का परिणाम भी वर्ष 2026 में जाकर जारी हुआ। वहीं 2023 बैच के अंतिम वर्ष का परिणाम भी लंबित बताया जा रहा है।
छात्रों का कहना है कि डिग्री नहीं मिलने के कारण वे आगे की पढ़ाई, इंटर्नशिप, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों में समय पर शामिल नहीं हो पा रहे हैं। इसी कारण लंबे समय से चली आ रही नाराजगी अब बड़े आंदोलन का रूप ले चुकी है।
कोर्ट में लंबित मामले का हवाला दे रहा विश्वविद्यालय
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि जब भी वे विश्वविद्यालय प्रशासन से परीक्षा और परिणाम को लेकर जानकारी मांगते हैं तो उन्हें न्यायालय में चल रहे मामलों का हवाला दिया जाता है।
छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि किस बैच की परीक्षा किस आधार पर रोकी गई है और किस विद्यार्थी का परिणाम या डिग्री क्यों लंबित है।
छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रत्येक बैच की स्थिति अलग-अलग स्पष्ट करे और परीक्षा, परिणाम तथा डिग्री को लेकर स्पष्ट और समयबद्ध योजना जारी करे।
लिखित समाधान तक जारी रहेगा आंदोलन
बुधवार से शुरू हुए इस प्रदर्शन में कांग्रेस और भारतीय किसान यूनियन का समर्थन मिलने के बाद आंदोलन और तेज हो गया है। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए पुतला भी फूंका।
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि वे कई बार बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस समय सीमा नहीं मिली है। इसलिए इस बार वे केवल मौखिक आश्वासन पर आंदोलन समाप्त करने को तैयार नहीं हैं।
छात्रों की मांग है कि सभी लंबित परीक्षाओं की तिथि घोषित की जाए, जिन बैच के परिणाम रुके हुए हैं उन्हें जारी किया जाए और पात्र विद्यार्थियों की डिग्री प्रक्रिया जल्द पूरी की जाए।
छात्रों ने साफ कहा है कि जब तक विश्वविद्यालय की ओर से लिखित रूप में समयबद्ध समाधान नहीं दिया जाता, तब तक विश्वविद्यालय परिसर में उनका आंदोलन जारी रहेगा।
हाईकोर्ट के अंतिम फैसले के बाद होगा समाधान: रजिस्ट्रार
इस पूरे विवाद और छात्रों के प्रदर्शन को लेकर उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार शिव कुमार बरनवाल का कहना है कि छात्रों का मामला गैर-काउंसलिंग के माध्यम से हुए प्रवेश से जुड़ा है और यह मामला फिलहाल उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
उन्होंने कहा कि अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही छात्रों की परीक्षा और परिणाम जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इसके अलावा यदि एनसीआई की ओर से इन छात्रों को नियमित करने का निर्णय लिया जाता है तो उसके बाद भी आगे की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
फिलहाल विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों का प्रदर्शन जारी है और टंकी पर चढ़े पांच छात्रों को नीचे उतारने तथा आंदोलन समाप्त कराने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से किसी ठोस समाधान का इंतजार किया जा रहा है।









