हल्द्वानी रेलवे भूमि विवाद पर आज सुप्रीम फैसला! 4,365 मकानों और 50 हजार से ज्यादा लोगों का क्या होगा? बनभूलपुरा में पुलिस अलर्ट

हल्द्वानी न्यूज़- बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में सुप्रीम कोर्ट बुधवार को फैसला सुना सकता है। मामला सुप्रीम कोर्ट की कार्यसूची में तीसरे नंबर पर सूचीबद्ध है। फैसले को देखते हुए हल्द्वानी में पुलिस और प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। बनभूलपुरा क्षेत्र को जोन और सेक्टर में बांटकर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस बल की तैनाती के साथ ड्रोन से भी पूरे इलाके की निगरानी की जा रही है।
यह मामला हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास की जमीन पर बसे बनभूलपुरा, गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर क्षेत्र से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक करीब 30.040 हेक्टेयर सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण का मामला है। इस क्षेत्र में करीब 4,365 मकान बताए गए हैं, जहां 50 हजार से ज्यादा लोग रहते हैं। रेलवे ने कोर्ट को बताया है कि हल्द्वानी प्रोजेक्ट के तहत रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए करीब 30.65 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है।
2007 से अदालत में चल रहा विवाद
रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का विवाद वर्ष 2007 से अदालतों में चल रहा है। अलग-अलग समय पर रेलवे और राज्य सरकार की ओर से जमीन खाली कराने की कोशिश की गई, लेकिन प्रभावित लोगों की कानूनी चुनौतियों के चलते मामला लगातार अदालतों में चलता रहा।
दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे को एक सप्ताह का नोटिस देकर अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया था। जरूरत पड़ने पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की सहायता लेने की अनुमति भी दी गई थी। इसके बाद प्रभावित परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों को रातों-रात बेघर नहीं किया जा सकता। बाद की सुनवाई में पुनर्वास के मानवीय पहलू पर भी जोर दिया गया।
8 फरवरी 2024 की हिंसा में गई थी 6 लोगों की जान
इसी इलाके में 8 फरवरी 2024 को नगर निगम की कार्रवाई के बाद हिंसा भड़क गई थी। नगर निगम ने एक अवैध मदरसे और नमाज के लिए बनाई गई एक इमारत को ध्वस्त किया था। इसके बाद भीड़ ने पुलिस और नगर निगम की टीम पर हमला कर दिया। बनभूलपुरा थाने को घेरकर पथराव किया गया।
हिंसा में 6 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि करीब 300 पुलिसकर्मी और नगर निगम कर्मचारी घायल हुए थे। हालात को देखते हुए प्रशासन ने इलाके में कर्फ्यू लगाया था और उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए थे।
रेलवे का दावा—जमीन उसके रिकॉर्ड में दर्ज
रेलवे का कहना है कि विवादित जमीन उसके रिकॉर्ड में दर्ज है। अपने पक्ष में रेलवे ने पुराने नक्शों, 1959 की अधिसूचना, 1971 के राजस्व रिकॉर्ड और 2017 में किए गए सर्वे का हवाला दिया है। रेलवे के मुताबिक जमीन प्रस्तावित रेल परियोजनाओं और रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए जरूरी है।
वहीं प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे दशकों से इस इलाके में रह रहे हैं। कई लोगों के नाम नगर निगम के हाउस टैक्स रिकॉर्ड में दर्ज हैं और उनके पास बिजली-पानी के कनेक्शन भी हैं। कुछ परिवारों ने जमीन और मकानों पर अपने अधिकार से संबंधित दस्तावेज भी अदालत के सामने रखे हैं।
सिर्फ मकान नहीं, स्कूल-मस्जिद-मंदिर समेत कई संस्थान
विवादित क्षेत्र करीब 2.2 किलोमीटर के हिस्से में फैला है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार यहां 3 सरकारी स्कूल, 11 मान्यता प्राप्त निजी स्कूल, 10 मस्जिदें, 12 मदरसे, एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र और एक मंदिर भी हैं। यही वजह है कि मामले में सिर्फ मकानों को हटाने का सवाल नहीं, बल्कि यहां रहने वाले हजारों लोगों और मौजूद सार्वजनिक एवं धार्मिक ढांचों के भविष्य का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है।
PMAY के जरिए पुनर्वास की कवायद
24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावित परिवारों की पात्रता तय करने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवेदन करने का निर्देश दिया था। उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को विशेष कैंप लगाकर प्रभावित परिवारों से आवेदन लेने के निर्देश दिए गए थे। आवेदन प्रक्रिया 31 मार्च 2026 तक पूरी करने को कहा गया था।
कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक रेलवे और राज्य सरकार की ओर से ढांचे हटाए जाने की स्थिति में प्रत्येक परिवार के मुखिया को छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये की अनुग्रह राशि देने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसके अलावा 13 परिवारों के छोटे भूखंडों पर मालिकाना हक के दावे भी कोर्ट के सामने आए हैं।
7 हजार से ज्यादा फॉर्म बांटे, हजारों आवेदन जमा
PMAY को लेकर बनभूलपुरा में विशेष कैंप लगाए गए थे। इस दौरान 7 हजार से ज्यादा फॉर्म बांटे गए, जबकि 31 मार्च तक करीब 4,522 आवेदन जमा होने की रिपोर्ट सामने आई थी। बाद में करीब 7 हजार आवेदन प्राप्त हुए, लेकिन जांच के दौरान कई ऐसे आवेदक भी सामने आए जिनके पास पहले से मकान होने या सरकारी आवास योजना का लाभ मिलने की बात सामने आई।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं। फैसला आने के बाद यह साफ होगा कि विवादित रेलवे भूमि पर वर्षों से रह रहे हजारों परिवारों के भविष्य को लेकर अदालत क्या दिशा-निर्देश देती है। फिलहाल संभावित फैसले को देखते हुए प्रशासन ने पूरे बनभूलपुरा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।









