भालू के आतंक से खाली हुआ पौड़ी का बस्ताग गांव, 1727 पहुंची निर्जन गांवों की संख्या

देहरादून न्यूज़– उत्तराखंड में वन्यजीवों के बढ़ते हमले अब पहाड़ों से हो रहे पलायन की एक बड़ी वजह बनते जा रहे हैं। पौड़ी जिले के पोखड़ा विकासखंड की ग्रामसभा पणिया का तोक गांव बस्ताग इसकी ताजा मिसाल है, जहां भालू के लगातार हमलों से त्रस्त होकर गांव में रह रहा अंतिम परिवार भी गांव छोड़ने को मजबूर हो गया। इसके साथ ही राज्य में पूरी तरह निर्जन हो चुके गांवों की संख्या बढ़कर 1727 हो गई है।
बस्ताग गांव पहले ही पलायन की मार झेल रहा था और यहां केवल हरीश प्रसाद नौटियाल का परिवार ही निवास कर रहा था। बीते एक सप्ताह के भीतर भालू ने इस परिवार की आजीविका की रीढ़ तोड़ दी। भालू ने उनकी दुधारू गाय, बैलों की जोड़ी और बकरियों समेत कुल छह मवेशियों को मार डाला। इतना ही नहीं, भालू घर के आंगन तक पहुंचने लगा, जिससे परिवार की सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो गया।
लगातार हो रहे हमलों और भय के माहौल के चलते हरीश प्रसाद नौटियाल अपने परिवार के साथ गांव छोड़कर पास के एक गांव में शरण लेने को मजबूर हो गए। आजीविका का कोई वैकल्पिक साधन न होने के कारण परिवार के सामने जीवनयापन की गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग हरकत में आया है। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) आरके मिश्र ने गढ़वाल वन प्रभाग के डीएफओ को निर्देश दिए हैं कि प्रभावित परिवार को तत्काल सुरक्षा मुहैया कराई जाए। साथ ही भालू द्वारा मारे गए सभी छह मवेशियों का मुआवजा शीघ्र अदा करने के आदेश दिए गए हैं।
आरके मिश्र ने बताया कि बस्ताग गांव छोड़ने वाले परिवार से गांव वापस लौटने का आग्रह किया जाएगा और विभाग की ओर से उन्हें हरसंभव सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है और इसे कम करने के लिए नई रणनीति बनाकर प्रभावी ढंग से लागू की जाएगी, ताकि जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रहें।
राज्य में लगातार खाली हो रहे गांवों का यह परिदृश्य चिंता बढ़ाने वाला है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वन्यजीव हमलों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन और तेज हो सकता है, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।








