उत्तराखण्डगढ़वाल,

जनता पर सख्ती, सरकारी वाहनों को छूट! देहरादून में 731 सरकारी वाहन बिना पीयूसीसी, पुलिस विभाग सबसे आगे

देहरादून न्यूज़– सड़कों पर प्रदूषण के नाम पर आम लोगों के वाहनों का चालान काटने वाली पुलिस खुद कानून की सबसे बड़ी उल्लंघनकर्ता बनकर सामने आई है। सरकारी आंकड़ों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि राजधानी देहरादून में सैकड़ों सरकारी वाहन बिना वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसीसी) के सड़कों पर दौड़ रहे हैं।

 

आरटीओ (प्रशासन) संदीप सैनी द्वारा वाहन सॉफ्टवेयर के माध्यम से सरकारी विभागों के वाहनों की जांच की गई। जांच में सामने आया कि राजधानी में कुल 731 सरकारी वाहन बिना वैध पीयूसीसी के पाए गए हैं। इनमें दोपहिया से लेकर भारी वाहन तक शामिल हैं।

 

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें सबसे ज्यादा 320 वाहन पुलिस विभाग के हैं, जो बिना वैध प्रदूषण प्रमाणपत्र के संचालित हो रहे थे। यानी जिन पर कानून लागू कराने की जिम्मेदारी है, वही विभाग नियमों का सबसे बड़ा उल्लंघन करता नजर आया।

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पुलिस के बाद पशुपालन विभाग के 57 वाहन, वन विभाग और स्वास्थ्य महानिदेशालय के 38-38 वाहन, कार्यकारी अभियंता श्रेणी के 22 वाहन और राज्य कर विभाग के सात वाहन नियमों के खिलाफ पाए गए। इसके अलावा जीएसटी, आबकारी, राज्य संपत्ति विभाग, राजस्व बोर्ड और जिला प्रशासन के कई वाहन भी बिना वैध प्रमाणपत्र के सड़कों पर दौड़ते मिले।

 

परिवहन नियमों के अनुसार नियम 115(7) के तहत प्रत्येक वाहन के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र अनिवार्य है। वहीं मोटर वाहन अधिनियम की धारा 190(2) के तहत पहली बार पकड़े जाने पर 2,500 रुपये जुर्माना और चालक का लाइसेंस तीन माह के लिए निलंबित करने का प्रावधान है। दूसरी बार यही अपराध होने पर 5,000 रुपये जुर्माना और फिर तीन माह का लाइसेंस निलंबन तय है।

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इसके बावजूद सवाल यह उठ रहा है कि क्या कानून का डर सिर्फ आम नागरिक के लिए है? सरकारी वाहन बिना पीयूसीसी कैसे चलते रहे और अब तक किसी की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?

 

इस मामले में परिवहन विभाग ने संबंधित विभागों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सभी विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि जो वाहन संचालन योग्य हैं और वर्तमान में उपयोग में हैं, वे सात दिनों के भीतर प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाएं। तय समयसीमा के बाद बिना पीयूसीसी या टैक्स चल रहे वाहनों पर चालान की कार्रवाई की जाएगी।

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यह पहला मौका नहीं है जब सरकारी तंत्र की लापरवाही उजागर हुई हो। सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ कागजी चेतावनी बनकर रह जाएगी या फिर सरकारी विभागों पर भी वही कानून लागू होगा, जो आम जनता पर सख्ती से थोपा जाता है।