उत्तराखण्डकुमाऊं,

मां की कमाई या कर्ज का बहाना नहीं चलेगा: हाई कोर्ट, बच्चे का भरण-पोषण पिता की पहली जिम्मेदारी

नैनीताल न्यूज़– उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर नहीं बच सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का भरण-पोषण सर्वोच्च दायित्व है और कोई भी निजी वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकता।

 

🟨 ₹8,000 प्रतिमाह भरण-पोषण का आदेश बरकरार
न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने रुड़की परिवार न्यायालय के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

 

यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें बच्चे की मां ने भरण-पोषण की मांग की थी। परिवार न्यायालय ने आवेदन स्वीकार करते हुए आदेश दिया था कि पिता आवेदन की तारीख से ही यह राशि अदा करे।

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🟨 पिता ने दी ये दलील
पिता ने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल करते हुए कहा कि वह और उसकी पत्नी दोनों सरकारी सेवा में हैं—वह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में और पत्नी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यरत है। ऐसे में पूरे भरण-पोषण का बोझ केवल उस पर डालना उचित नहीं है।

 

उसने यह भी तर्क दिया कि उसकी आय का बड़ा हिस्सा ऋण की किश्तों, माता-पिता और भाई-बहनों की जिम्मेदारियों में खर्च हो जाता है।

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🟨 कोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि:
बच्चे के पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है, इसलिए पिता का दायित्व स्पष्ट है।

 

मां की आय को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह पिता को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।

 

धारा 125 एक सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य अभाव और दरिद्रता को रोकना है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग बच्चे को माता-पिता की सामाजिक स्थिति के अनुरूप जीवन स्तर मिलना चाहिए।

 

🟨 कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां नहीं बनेंगी ढाल
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्ज की किश्तें या अन्य निजी खर्च स्वेच्छिक दायित्व हैं और ये बच्चे के भरण-पोषण के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते।
माता-पिता या अन्य स्वजनों की जिम्मेदारियां भी इस वैधानिक कर्तव्य को समाप्त नहीं करतीं।

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🟥 पुनरीक्षण याचिका खारिज
अदालत ने माना कि 8,000 रुपये मासिक की राशि न तो अधिक है और न ही अनुचित। साथ ही आवेदन की तारीख से भुगतान का आदेश भी सही ठहराया गया।

 

कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए पुनरीक्षण याचिका खारिज की जाती है। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि यह अंतरिम भरण-पोषण है और अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।