उत्तराखंड के पहाड़ों में क्यों बढ़ रही ‘कुंवारों की पीढ़ी’? 5 बड़ी वजहें आईं सामने, एक्सपर्ट बोले- सिर्फ नौकरी से नहीं बन रही बात
पलायन, शहरों की ओर बढ़ता रुझान, बदलती सामाजिक सोच और खराब लिंगानुपात बना वजह; गांवों में गहराता जा रहा विवाह संकट

उत्तराखंड के पहाड़ अब सिर्फ खाली होते गांवों की वजह से चिंता में नहीं हैं, बल्कि यहां तेजी से बढ़ रही अविवाहित युवकों की संख्या भी बड़ा सामाजिक संकट बनती जा रही है। पर्वतीय जिलों के कई गांवों में 30 से 40 वर्ष की उम्र पार कर चुके युवकों की लंबी कतार दिखाई देने लगी है। परिवार रिश्ते तलाशते-तलाशते थक चुके हैं, लेकिन शादी की बात आगे नहीं बढ़ पा रही।
राज्य के अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग के आंकड़े इस बदलती सामाजिक तस्वीर को साफ दिखाते हैं। देहरादून जिले में ही 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग के करीब 35 हजार युवक अविवाहित हैं, जबकि इसी आयु वर्ग में लड़कियों की संख्या लगभग 11 हजार है। 30 से 34 वर्ष आयु वर्ग में 10,103 युवक अविवाहित हैं, जबकि लड़कियों की संख्या 3,031 है। वहीं 35 वर्ष से अधिक आयु के 7,025 और 40 वर्ष से अधिक आयु के 3,281 पुरुष अब भी अविवाहित हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक संजीव कंडवाल का कहना है कि आने वाली जनगणना 2026-27 उत्तराखंड के सामने यह भी स्पष्ट करेगी कि पहाड़ों में 30 पार अविवाहित युवकों की वास्तविक संख्या कितनी है और क्या शादी न होना भी पलायन का एक बड़ा कारण बन चुका है।
गांवों में बढ़ रही ‘कुंवारों की पीढ़ी’
संजीव कंडवाल के मुताबिक, शायद ही कोई ऐसा पहाड़ी गांव बचा हो जहां 30 पार युवकों की संख्या तेजी से न बढ़ रही हो। गांवों में अब एक पूरी पीढ़ी ऐसी दिखाई देने लगी है, जिसने लगभग मान लिया है कि उनकी शादी नहीं होगी। नई पीढ़ी भी इस बदलती सामाजिक स्थिति को देखकर बड़ी हो रही है।
ग्रामीण इलाकों में अब रिश्तों के लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि पूरा पारिवारिक ढांचा देखा जा रहा है। यदि परिवार गांव में रहता है तो कई बार शहर में नौकरी करने वाला युवक भी रिश्तों की दौड़ में पीछे छूट जाता है। यही वजह है कि गांव से जुड़े युवकों के लिए विवाह प्रस्ताव लगातार कम हो रहे हैं।
इन 5 वजहों से बढ़ रहा पहाड़ों में विवाह संकट
1. पलायन अब आर्थिक नहीं, मनोवैज्ञानिक संकट भी
उत्तराखंड में लंबे समय से पलायन बड़ा मुद्दा रहा है, लेकिन अब इसका असर सामाजिक रिश्तों पर भी दिखाई देने लगा है। राज्य सरकार के पलायन आयोग की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य गठन के बाद 1792 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक अब गांव में रहने वाले युवक खुद को पिछड़ा महसूस करने लगे हैं। वहीं लड़कियों के परिवार शहर में बसे या शहरी जीवन से जुड़े रिश्तों को प्राथमिकता देने लगे हैं। ऐसे में शादी गांव से बाहर निकलने का माध्यम भी बनती जा रही है।
2. शहर की लाइफस्टाइल बनी बड़ी वजह
पहाड़ों में सड़क, अस्पताल, कॉलेज, इंटरनेट और रोजगार जैसी सुविधाओं की कमी लंबे समय से बनी हुई है। अब यही चीजें विवाह के फैसलों को भी प्रभावित कर रही हैं।
शहरी जीवनशैली को बेहतर भविष्य और सुरक्षित जीवन के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षा, मोबाइल इंटरनेट और शहरों से बढ़ते संपर्क ने युवाओं की सोच बदली है। अब विवाह केवल परिवार जोड़ने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनशैली तय करने वाला निर्णय भी बन चुका है।
3. खराब लिंगानुपात ने बढ़ाई चुनौती
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के अनुसार 2015-16 में उत्तराखंड में प्रति हजार लड़कों पर केवल 888 लड़कियां दर्ज की गई थीं। विशेषज्ञ मानते हैं कि बेटियों की कम होती संख्या भविष्य में विवाह संकट को और गहरा कर सकती है।
पहाड़ों में कई जगह महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है, लेकिन विवाह योग्य आयु वर्ग में लड़कियों की कमी और उनका शहरों की ओर बढ़ता रुझान युवकों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है।
4. फौजी और स्वरोजगार वाले युवकों की घटती प्राथमिकता
एक समय पहाड़ों में फौजी युवकों की सबसे ज्यादा मांग होती थी, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। दूसरी सरकारी नौकरियों और शहरी जीवन की प्राथमिकता बढ़ने से सेना में नौकरी करने वाले युवकों की सामाजिक प्राथमिकता पहले जैसी नहीं रही।
होटल व्यवसाय या स्वरोजगार से जुड़े युवकों को भी रिश्ते मिलने में कठिनाई हो रही है। कई गांवों में विवाह कराने वाले पंडित तक 40 वर्ष की उम्र पार करने के बाद अविवाहित हैं।
5. बढ़ रहा सामाजिक अकेलापन और निराशा
विशेषज्ञ इसे केवल विवाह संकट नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन की शुरुआत मान रहे हैं। बड़ी संख्या में युवकों का अविवाहित रह जाना मानसिक और सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकता है।
संजीव कंडवाल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में दिखाई देने वाली ‘रंडवा प्रथा’ का जिक्र करते हुए कहा कि वहां लंबे समय तक अविवाहित रहने वाले पुरुषों के सामाजिक और मानसिक दुष्प्रभाव देखने को मिले हैं। हालांकि उत्तराखंड की स्थिति अभी वहां तक नहीं पहुंची है, लेकिन संकेत चिंताजनक माने जा रहे हैं।
सोशल मीडिया में भी दिख रही युवाओं की पीड़ा
उत्तराखंड में इस विषय को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार वीडियो, गीत और पोस्ट वायरल हो रहे हैं। इनमें पहाड़ों के युवकों की पीड़ा, खाली होते गांव और रिश्तों के संकट को दिखाया जा रहा है। कई लोकगीतों और व्यंग्य वीडियो में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उभरने लगा है।
डेस्टिनेशन वेडिंग वाला राज्य, लेकिन अपने युवक परेशान
एक ओर उत्तराखंड देश-दुनिया में डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए नई पहचान बना रहा है। ऋषिकेश, मसूरी और नैनीताल जैसे शहर शादी समारोहों के बड़े केंद्र बन चुके हैं। दूसरी ओर राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में हजारों युवक जीवनसाथी की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है। उनका कहना है कि पलायन रोकने और गांवों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के बिना सामाजिक संतुलन बहाल करना मुश्किल होगा।








