पद्मभूषण से सम्मानित हुए भगत सिंह कोश्यारी, शिक्षा से राजनीति तक छोड़ी गहरी छाप

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को सोमवार को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया। नई दिल्ली के गणतंत्र मंडप में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। उन्हें शिक्षा, सामाजिक जीवन, पत्रकारिता और सार्वजनिक सेवा में लंबे समय तक दिए गए योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
उत्तराखंड में ‘भगत दा’ के नाम से प्रसिद्ध कोश्यारी का राजनीतिक और सामाजिक सफर बेहद प्रेरणादायक माना जाता है। बागेश्वर के एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने मुख्यमंत्री, सांसद और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पदों तक अपनी पहचान बनाई। सादगीपूर्ण जीवनशैली, अनुशासन और संगठनात्मक क्षमता उनकी प्रमुख पहचान रही है।
बागेश्वर के दूरस्थ गांव से शुरू हुआ सफर
भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून 1942 को उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के दूरस्थ गांव पलानधुरा में हुआ था। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े कोश्यारी ने शिक्षा को जीवन का सबसे बड़ा माध्यम बनाया। उन्होंने 1964 में आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के एटा में लेक्चरर के रूप में करियर की शुरुआत की, लेकिन जल्द ही सामाजिक और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सक्रिय हो गए।

सीमांत क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाई
कोश्यारी ने शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे मजबूत आधार माना। उन्होंने सबसे पहले यूपी के कासगंज में सरस्वती शिशु मंदिर से अपनी शैक्षिक यात्रा शुरू की। वर्ष 1966 में उन्होंने सीमांत जिले Pithoragarh में सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की। इसके अलावा विवेकानंद इंटर कॉलेज की शुरुआत कर दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम किया।
पत्रकारिता के जरिए समाज को किया जागरूक
भगत सिंह कोश्यारी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया। उन्होंने पिथौरागढ़ से हिंदी साप्ताहिक पत्रिका “पर्वत पीयूष” का प्रकाशन शुरू किया। वर्ष 1979 से 1990 तक वे Kumaun University की कार्यकारी परिषद के सदस्य भी रहे। आपातकाल के दौरान उनकी सक्रियता के चलते उन्हें मीसा कानून के तहत जेल भी जाना पड़ा।
उत्तराखंड आंदोलन से मुख्यमंत्री बनने तक
वर्ष 1997 में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद बनी पहली सरकार में उन्होंने कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। ऊर्जा मंत्री रहते हुए उन्होंने टिहरी हाइड्रो परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भी बने। उनकी पहचान संगठन और प्रशासन दोनों पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेता के रूप में बनी।
संसद से राजभवन तक पहुंचा सफर
भगत सिंह कोश्यारी 2008 में राज्यसभा सदस्य बने। इसके बाद 2014 में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। संसद में उन्होंने वन रैंक वन पेंशन और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। 5 सितंबर 2019 को उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया। अगस्त 2020 में उन्होंने गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।
लेखक के रूप में भी बनाई अलग पहचान
राजनीति और समाज सेवा के साथ-साथ भगत सिंह कोश्यारी ने लेखन के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने “उत्तरांचल प्रदेश क्यों” और “उत्तरांचल प्रदेशः संघर्ष एवं समाधान” जैसी पुस्तकें लिखीं, जिनमें उत्तराखंड राज्य आंदोलन, विकास और क्षेत्रीय चुनौतियों पर विस्तार से विचार रखे गए हैं।









