उत्तराखण्डकुमाऊं,

लालकुआँ- मंत्री कैड़ा ने कहा- CM समाधान निकालेंगे, बिंदुखत्ता से जवाब- ‘झुनझुना नहीं, राजस्व गांव की अधिसूचना चाहिए’

लालकुआं न्यूज़- नैनीताल जिले के बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन रविवार को 44वें दिन निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। करीब 25 हजार लोगों की महारैली के बाद आंदोलनकारियों ने तहसील परिसर में डेरा डाल दिया है। बारिश के बीच शुरू हुआ प्रदर्शन अब अनिश्चितकालीन धरने में बदल गया है। आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक सरकार की ओर से लिखित आश्वासन नहीं मिलता, वे घर वापस नहीं लौटेंगे।

 

 

आंदोलनकारियों और कैबिनेट मंत्री रामसिंह कैड़ा के बीच हुई बातचीत के दौरान बिंदुखत्ता के प्रतिनिधिमंडल की मुख्यमंत्री से फोन पर बातचीत भी कराई गई। मुख्यमंत्री की ओर से कैबिनेट में बिंदुखत्ता का मामला लाकर समाधान निकालने की बात कही गई। वहीं कैबिनेट मंत्री रामसिंह कैड़ा ने आंदोलनकारियों से मुख्यमंत्री पर भरोसा रखने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की।

 

 

लिखित आश्वासन से कम पर तैयार नहीं आंदोलनकारी

बातचीत के बावजूद आंदोलनकारियों का रुख स्पष्ट है। बिंदुखत्ता वन अधिकार समिति के अध्यक्ष उमेश भट्ट ने कहा कि मंत्री रामसिंह कैड़ा ने उनकी बात मुख्यमंत्री तक पहुंचाई, इसके लिए वे उनका आभार व्यक्त करते हैं, लेकिन आंदोलनकारी आज घर नहीं लौटेंगे।

 

 

उन्होंने तहसील परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू करने का ऐलान करते हुए कहा कि सरकार को लिखित में बताना होगा कि बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा कब मिलेगा और इसकी अधिसूचना कब जारी की जाएगी।

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यूपी के दौर से बसा बिंदुखत्ता, फिर भी जमीन के अधिकार का इंतजार

आंदोलनकारियों के अनुसार बिंदुखत्ता की बसावट उत्तर प्रदेश के समय से चली आ रही है। वर्ष 1932 से यहां बसासत के प्रमाण होने का भी दावा किया जाता है। करीब पांच दशक से क्षेत्र को राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग उठती रही है।

 

 

बिंदुखत्ता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि पूरा क्षेत्र आरक्षित वन भूमि के रूप में दर्ज है। इसके चलते यहां रहने वाले लोगों के पास सामान्य राजस्व रिकॉर्ड और जमीन का मालिकाना हक नहीं है। इसका असर खसरा-खतौनी, जमीन की खरीद-बिक्री, बैंक ऋण और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी पड़ता है।

 

 

आंदोलनकारियों के मुताबिक वर्ष 1966 में क्षेत्र को आरक्षित वन घोषित किया गया था। इसके बाद बंदोबस्ती की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो सकी। वन भूमि के दर्जे और आवश्यक मंजूरियों के चलते बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा देने की प्रक्रिया वर्षों से लंबित है।

 

 

‘भरोसे को भी साढ़े 9 साल हो गए, अब लिखित चाहिए’

वन अधिकार समिति के अध्यक्ष उमेश भट्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री की ओर से भरोसा रखने की बात कही गई है, लेकिन इस भरोसे को भी साढ़े नौ साल हो चुके हैं। अब केवल भरोसे के आधार पर आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा।

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उन्होंने कहा कि सरकार दूसरे गांवों को मिले राजस्व गांव के दर्जे का अध्ययन कर फैसला लेने की बात करती है, जबकि उनकी समिति पिछले ढाई से तीन वर्षों से ऐसे गांवों की फाइलें सरकार को उपलब्ध कराती आ रही है।

 

 

उमेश भट्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब समिति पहले ही संबंधित फाइलें सरकार को उपलब्ध करा चुकी है तो आखिर उन फाइलों का अध्ययन क्यों नहीं किया जा रहा है।

 

 

कैड़ा बोले- ‘सीएम आपके साथ हैं, बातचीत से निकलेगा समाधान’

कैबिनेट मंत्री रामसिंह कैड़ा ने कहा कि मुख्यमंत्री ने उन्हें बताया है कि बिंदुखत्ता के लोग उनके परिवार का हिस्सा हैं और सरकार समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के सभी खत्तों में रहने वाले लोग भी सरकार के लिए परिवार की तरह हैं।

 

 

कैड़ा के मुताबिक मुख्यमंत्री ने कैबिनेट बैठक में बिंदुखत्ता का मामला रखने की बात कही है, ताकि कैबिनेट स्तर पर इस समस्या का समाधान निकाला जा सके। सरकार चाहती है कि आंदोलन के बजाय बातचीत के माध्यम से समस्या का हल निकले।

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उन्होंने बताया कि बिंदुखत्ता के डेलिगेशन से मुख्यमंत्री की फोन पर बातचीत भी कराई गई है। मुख्यमंत्री का कहना है कि बिंदुखत्ता अब एक गांव का रूप ले चुका है और यहां तीन पीढ़ियों से लोग रह रहे हैं। ऐसे में चौथी पीढ़ी को भी इसी समस्या का सामना न करना पड़े, इसके लिए समाधान निकालना जरूरी है।

 

 

कैड़ा ने यह भी कहा कि उनका बचपन बिंदुखत्ता में बीता है और छात्र जीवन से ही उन्हें यहां के लोगों का समर्थन मिलता रहा है।

 

 

अब सरकार के लिखित आश्वासन पर टिकी निगाहें

25 हजार लोगों की महारैली और उसके बाद तहसील परिसर में शुरू हुए अनिश्चितकालीन धरने से बिंदुखत्ता का आंदोलन अब नए चरण में पहुंच गया है। एक ओर सरकार बातचीत और कैबिनेट के माध्यम से समाधान निकालने की बात कर रही है, वहीं आंदोलनकारी लिखित आश्वासन और राजस्व गांव की अधिसूचना की समयसीमा की मांग पर अड़े हैं। अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी है।