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होर्मुज तनाव से सिर्फ तेल नहीं, इंटरनेट पर भी संकट! केबल्स को खतरा, भारत में स्पीड हो सकती है धीमी

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका खतरा वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क पर भी मंडराने लगा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जिसे दुनिया का सबसे अहम एनर्जी रूट माना जाता है, अब एक “डिजिटल चोकपॉइंट” के रूप में भी सामने आ रहा है।

 

दरअसल, इस समुद्री मार्ग से जहां दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल और 25% एलएनजी (LNG) गुजरता है, वहीं इसी रास्ते के नीचे महत्वपूर्ण फाइबर ऑप्टिक इंटरनेट केबल्स भी बिछी हुई हैं। ऐसे में अगर क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है या इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो भारत समेत पूरी दुनिया में इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

 

समुद्र के नीचे चलता है दुनिया का इंटरनेट
अक्सर यह माना जाता है कि इंटरनेट सैटेलाइट के जरिए चलता है, लेकिन हकीकत में दुनिया का 95 से 97% डेटा ट्रांसमिशन समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए होता है।

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भारत को यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया से जोड़ने वाली कई प्रमुख केबल्स इसी रूट के आसपास से गुजरती हैं, जिनमें SEA-ME-WE, AAE-1 और EIG शामिल हैं।

 

 

भारत के लिए क्यों बड़ा खतरा?
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था काफी हद तक इन समुद्री इंटरनेट रूट्स पर निर्भर है। देश का अधिकांश इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से होकर आता है।

 

यदि इन केबल्स को नुकसान होता है, तो डेटा ट्रैफिक को वैकल्पिक लंबे रास्तों से भेजना पड़ेगा, जिससे:

  • इंटरनेट की स्पीड धीमी हो जाएगी
  • वीडियो स्ट्रीमिंग और कॉलिंग में दिक्कतें आएंगी
  • क्लाउड सर्विस और ऑनलाइन काम प्रभावित होंगे
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IT सेक्टर पर भारी असर का खतरा
भारत का आईटी और आउटसोर्सिंग सेक्टर करीब 250 बिलियन डॉलर का है, जो मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट्स के साथ रियल-टाइम कनेक्टिविटी पर निर्भर करता है।

 

केबल्स प्रभावित होने की स्थिति में कंपनियों को सर्विस एग्रीमेंट (SLA) टूटने, पेनाल्टी और बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा बैंकिंग ट्रांजेक्शन, जैसे SWIFT सिस्टम, और खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है।

 

क्या पूरी तरह बंद हो जाएगा इंटरनेट?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक इंटरनेट पूरी तरह बंद होने की संभावना बहुत कम है, क्योंकि नेटवर्क को इस तरह डिजाइन किया गया है कि एक रास्ता बंद होने पर ट्रैफिक दूसरे रास्तों पर डायवर्ट हो जाता है।

 

 

हालांकि, इस “री-रूटिंग” के कारण नेटवर्क पर लोड बढ़ेगा, जिससे इंटरनेट की स्पीड काफी धीमी हो सकती है। खासकर शेयर बाजार और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग जैसे सेक्टर पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।

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विकल्पों पर बढ़ रहा निवेश
इस खतरे को देखते हुए भारत समेत कई देश वैकल्पिक इंटरनेट रूट्स और तकनीकों पर निवेश बढ़ा रहे हैं। Starlink जैसी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को बैकअप के तौर पर देखा जा रहा है।

 

भविष्य में ऐसे केबल नेटवर्क विकसित करने की योजना भी है, जो संवेदनशील क्षेत्रों को बायपास कर सकें।

 

फिलहाल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ता तनाव यह साफ कर रहा है कि आने वाले समय में वैश्विक संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डिजिटल दुनिया भी इसकी चपेट में आ सकती है।