नई दिल्ली

18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से कानून बनाने पर विचार करने को कहा

नई दिल्ली- 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नाबालिगों के अकाउंट को लेकर कानून बनाने पर विचार करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में काम करने वाले सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को नाबालिगों से जुड़े भारतीय कानूनों का पालन करना होगा।

 

 

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस (JRCA) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

 

 

नियम सिर्फ गाइडलाइन तक सीमित न रहें

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि नाबालिगों से संबंधित शर्तें केवल गाइडलाइन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इंटरमीडियरी नियमों के तहत इन्हें वैधानिक रूप देने की संभावना पर विचार करने को कहा।

यह भी पढ़ें 👉  मोबाइल यूजर्स के लिए खुशखबरी! 28 दिन के रिचार्ज से मिलेगी राहत, TRAI ने बदले नियम

 

 

कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भारत की कानूनी जरूरतों के अनुरूप अपनी व्यवस्था तैयार करनी होगी।

 

 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 79 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहली नजर में यह मुद्दा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के दायरे में आता है।

 

 

नाबालिगों से जुड़े समझौतों पर भी चर्चा

JRCA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फूलका ने कोर्ट को बताया कि डेटा प्रोटेक्शन कानून के संबंधित प्रावधान 2027 में लागू होंगे। उन्होंने दलील दी कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए नए कानून के लागू होने तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है।

यह भी पढ़ें 👉  SIR पर चुनाव आयोग का बड़ा अपडेट: नोटिस वाले मतदाताओं के घर पहुंचेंगे BLO, ऑनलाइन सुनवाई को प्राथमिकता

 

 

उन्होंने कहा कि मौजूदा कानून के तहत नाबालिगों की ओर से किए गए समझौते शून्य माने जाते हैं।

 

 

वहीं, सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया कि माता-पिता की सहमति के आधार पर नियामकीय व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और बच्चे के बजाय माता-पिता के बीच अनुबंध की व्यवस्था हो सकती है।

 

 

विदेश में रजिस्टर्ड प्लेटफॉर्म्स को भी मानना होगा भारतीय कानून

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि भारत में काम करने वाले कई डिजिटल इंटरमीडियरीज विदेशों में रजिस्टर्ड या रेगुलेटेड हैं। इनमें अमेरिका की कंपनियां भी शामिल हैं।

 

 

कोर्ट ने कहा कि भारत में कारोबार या संचालन करने के दौरान इन प्लेटफॉर्म्स को भारतीय कानूनों का पालन करना होगा। केंद्र सरकार IT Act की धारा 79 के तहत इंटरमीडियरीज को नाबालिगों से जुड़े कानूनी प्रावधानों के पालन के लिए निर्देश दे सकती है।

यह भी पढ़ें 👉  त्योहारी सीजन से पहले बड़ा झटका! AC-TV समेत इलेक्ट्रॉनिक सामान 5-8% तक हो सकते हैं महंगे

 

 

बच्चों को ऑनलाइन कई तरह के खतरों का हवाला

याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के इस्तेमाल से जुड़े कई संभावित खतरों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, डिजिटल तस्करी और सेक्सटॉर्शन जैसे खतरे शामिल हैं।

 

 

इसके अलावा बच्चों के व्यवहार की प्रोफाइलिंग, निजी डेटा के गलत इस्तेमाल और साइबरबुलिंग को लेकर भी चिंता जताई गई है। कोर्ट की सुनवाई में इन मुद्दों के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था की जरूरत पर चर्चा हुई।