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(लाइफस्टाइल) क्या सामने वाला बोल रहा है झूठ? मनोविज्ञान के अनुसार इन 3 सवालों से मिल सकते हैं संकेत

हम सभी कभी न कभी ऐसी स्थिति में पड़ते हैं, जब हमें किसी की बात पर संदेह होता है। ऐसे में अक्सर लोग चेहरे के हाव-भाव या बॉडी लैंग्वेज देखकर सच और झूठ का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं। हालांकि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि केवल चेहरे के भाव देखकर किसी को झूठा साबित करना आसान नहीं होता।

 

 

विशेषज्ञों के अनुसार कई बार सच्चे लोग भी घबराहट या तनाव के कारण असामान्य व्यवहार कर सकते हैं, जबकि अनुभवी झूठ बोलने वाले पूरी तरह सामान्य दिखाई देते हैं। ऐसे में कुछ खास सवाल पूछकर झूठ और सच के बीच अंतर को समझने की कोशिश की जा सकती है।

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1. कहानी को उल्टे क्रम में सुनाने को कहें

मनोविज्ञान के मुताबिक, जो व्यक्ति किसी घटना को वास्तव में जी चुका होता है, उसके लिए उस घटना को अलग-अलग क्रम में याद करना अपेक्षाकृत आसान होता है। यदि किसी व्यक्ति से घटना को आखिर से शुरुआत तक दोबारा सुनाने को कहा जाए, तो सच बोलने वाला कुछ सोचकर कहानी बता सकता है। वहीं झूठ बोलने वाला अक्सर उलझ सकता है, क्योंकि उसे बनाई गई कहानी को नए क्रम में व्यवस्थित करना पड़ता है।

 

 

2. अचानक और अप्रत्याशित सवाल पूछें

झूठ बोलने वाले लोग आमतौर पर मुख्य कहानी की तैयारी कर लेते हैं, लेकिन उससे जुड़े छोटे-छोटे विवरणों पर उनका ध्यान कम होता है। ऐसे में घटना से जुड़े अप्रत्याशित सवाल पूछे जा सकते हैं, जैसे मौसम कैसा था, वहां सबसे पहले क्या देखा या आसपास क्या था। सच बोलने वाला व्यक्ति आमतौर पर सहजता से जवाब देता है, जबकि झूठ बोलने वाला रुक-रुक कर जवाब दे सकता है या अपने उत्तर बदल सकता है।

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3. कुछ देर बाद वही सवाल दोबारा पूछें

विशेषज्ञों का कहना है कि झूठी कहानी को लगातार एक जैसा बनाए रखना आसान नहीं होता। इसलिए कुछ समय बाद उसी विषय पर दोबारा सवाल पूछना उपयोगी हो सकता है। यदि व्यक्ति सच बोल रहा है तो उसके जवाब का मूल स्वरूप लगभग समान रहेगा, लेकिन झूठ बोलने की स्थिति में जवाबों में अंतर दिखाई दे सकता है।

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100 प्रतिशत सही नहीं है यह तरीका

मनोवैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि कोई भी सवाल या तरीका झूठ पकड़ने की 100 प्रतिशत गारंटी नहीं देता। तनाव, शर्म, घबराहट या भूलने की आदत के कारण भी लोगों के जवाब बदल सकते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले उसके व्यवहार, परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।